साहित्य क्या है? एक विस्तृत विवेचना

Shaksham Sir
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जब भी हम 'साहित्य' शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में किताबों की अलमारी, कविताओं की मधुरता, उपन्यासों की गहराई और कहानियों का एक अलग ही संसार उभर कर आता है। लेकिन क्या साहित्य का अर्थ केवल पुस्तकों का संग्रह मात्र है? क्या यह केवल उन पन्नों तक सीमित है जिन पर शब्द अंकित हैं? आइए, इस विस्तृत लेख में समझते हैं कि साहित्य वास्तव में क्या है, इसकी परिभाषा क्या है, इसके विभिन्न आयाम क्या हैं और क्यों यह मानव सभ्यता का अभिन्न अंग है।


साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थ


'साहित्य' शब्द संस्कृत भाषा के 'सहित' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है 'साथ में' या 'सम्मिलित'। साहित्य का शाब्दिक अर्थ होता है - 'सहित भाव' यानी समन्वय। प्राचीन काल में साहित्य उस विद्या को कहा जाता था जिसमें रस, छंद, अलंकार आदि सभी का समावेश होता था। आचार्य मम्मट के अनुसार - "साहित्यं काव्यम्" अर्थात साहित्य ही काव्य है।


आधुनिक संदर्भ में साहित्य का अर्थ व्यापक हो गया है। आज साहित्य उस समस्त लिखित सामग्री को कहते हैं जो मानवीय अनुभूतियों, विचारों, भावनाओं और कल्पनाओं को अभिव्यक्त करती है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों को उकेरने वाला दर्पण है।


प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई साहित्य की परिभाषाएँ


साहित्य को समझने के लिए आइए जानते हैं कि विभिन्न विद्वानों ने इसकी क्या परिभाषाएँ दी हैं:


डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अनुसार - "साहित्य वह कला है जिसमें मनुष्य के मन की बात, मन के भाव, शब्दों के द्वारा व्यक्त किये जाते हैं।"


आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को "मनोरंजन का सर्वोत्तम साधन" बताते हुए कहा - "जिसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय हो वही साहित्य है।"


जॉन ड्राइडन के अनुसार - "साहित्य मानव प्रकृति का सजीव चित्रण है।"


लेखक हरिवंश राय बच्चन कहते हैं - "साहित्य अनुभव का वह कोष है, जहाँ मानवता के अनमोल रत्न सुरक्षित रहते हैं।"


विलियम शेक्सपियर साहित्य को 'जीवन का दर्पण' मानते थे, जहाँ सद्गुणों का सम्मान और दुर्गुणों का परिष्कार होता है।


साहित्य के प्रमुख रूप


साहित्य का स्वरूप बहुत विस्तृत है। इसे मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है:


1. गद्य साहित्य - इसमें उपन्यास, कहानी, निबंध, जीवनी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, नाटक (गद्य भाग) आदि आते हैं। गद्य साहित्य घटनाओं, विचारों और तथ्यों को सरल एवं स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। प्रेमचन्द, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जयशंकर प्रसाद जैसे लेखकों ने गद्य साहित्य को समृद्ध किया।


2. पद्य साहित्य - यह साहित्य का वह रूप है जो छंद, लय और तुक से युक्त होता है। कविता, गीत, गज़ल, भजन, महाकाव्य, खंडकाव्य आदि इसके अंतर्गत आते हैं। पद्य में भावनाओं को अधिक सघनता और संक्षेप में अभिव्यक्त किया जाता है। सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत आदि के काव्य इसके उदाहरण हैं।


3. नाट्य साहित्य - यह साहित्य का वह रूप है जो मंच पर अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। कालिदास, भास, मोहन राकेश, नरेंद्र कोहली जैसे नाटककारों ने इस विधा को विकसित किया।


साहित्य के कार्य और उद्देश्य

साहित्य का समाज और व्यक्ति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। प्राचीन काल से इसके चार प्रमुख उद्देश्य माने गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। आइए समझते हैं आधुनिक सन्दर्भ में साहित्य के कार्य:


1. मनोरंजन - साहित्य का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन है। एक अच्छी कहानी या कविता पढ़ना हमें दिनभर की थकान से मुक्ति दिलाता है। यह हमें हँसाता है, रुलाता है, सोचने पर विवश करता है।


2. ज्ञानवर्धन - साहित्य हमें विभिन्न विषयों, संस्कृतियों, सभ्यताओं और समाजों के बारे में बताता है। ऐतिहासिक उपन्यास हमें अतीत से रूबरू कराते हैं। विज्ञान साहित्य हमें प्रकृति के रहस्य समझाता है।


3. संवेदना का विकास - साहित्य हममें सहानुभूति, करुणा, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं का विकास करता है। जब हम किसी पात्र के दुख-सुख को पढ़ते हैं तो उससे हमारी संवेदनशीलता बढ़ती है।


4. विचारों का प्रसार - साहित्य के माध्यम से नवीन विचारों का प्रसार होता है। गुलामी के समय क्रांतिकारी साहित्य ने स्वतंत्रता की चेतना बढ़ाई। समाज सुधारकों ने साहित्य के द्वारा ही कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई।


5. सांस्कृतिक संरक्षण - साहित्य किसी भाषा, समाज और संस्कृति की धरोहर होता है। वेद, पुराण, रामायण, महाभारत आज भी हमारी संस्कृति के आधार स्तंभ हैं।


6. आत्मचिंतन को प्रेरित करना - अच्छा साहित्य हमें अपने जीवन पर विचार करने और आत्म-विश्लेषण करने को प्रेरित करता है।


साहित्य के प्रमुख घटक या तत्व


आचार्यों ने साहित्य के तीन मूल तत्व बताए हैं - रस, अलंकार और छंद। इसके साथ ही शैली और भाषा भी महत्वपूर्ण हैं।


रस - रस का अर्थ है साहित्य पढ़ने या सुनने से जो आनंद मिलता है। नवरस माने गए हैं - शृंगार, हास्य, करुणा, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत।


अलंकार - ये साहित्य की सुंदरता बढ़ाने वाले साधन हैं। अनुप्रास, उपमा, रूपक, यमक आदि अलंकारों से साहित्य अधिक आकर्षक होता है।


भाषा और शैली - जिस भाषा में साहित्य लिखा जाता है, उसकी अपनी विशेषताएँ होती हैं। किसी की भाषा सरल, तो किसी की संस्कृतनिष्ठ। शैली लेखक के व्यक्तित्व को दर्पित करती है।


साहित्य का ऐतिहासिक विकास


प्राचीन काल - भारतीय साहित्य का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद (लगभग 1500 ई.पू.) संसार के प्राचीनतम ग्रंथों में एक है। वाल्मीकि रामायण और वेदव्यास कृत महाभारत महाकाव्य साहित्य की अमूल्य निधि हैं। कालिदास, भास, बाणभट्ट जैसे साहित्यकारों ने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया।


मध्यकाल - भक्तिकाल में कबीर, सूर, तुलसी, मीरा ने भक्तिरस से साहित्य सराबोर किया। रीतिकाल में आचार्यों ने साहित्यशास्त्र को व्यवस्थित किया।


आधुनिक काल - भारतेन्दु युग से साहित्य में नवजागरण आया। द्विवेदी युग में खड़ी बोली गद्य का विकास हुआ। छायावाद के बाद प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता का दौर आया। प्रेमचन्द, निराला, पंत, महादेवी वर्मा, शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश जैसे साहित्यकारों ने हिंदी साहित्य को नई ऊँचाइयाँ दीं।


हिंदी साहित्य का विशेष महत्व


हिंदी साहित्य का अपना गौरवमयी इतिहास रहा है। खड़ी बोली, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी, मैथिली समेत अनेक बोलियों में लिखा गया हिंदी साहित्य जनता का साहित्य रहा है। आधुनिक समय में हिंदी साहित्य ने गाँव-शहर, स्त्री-पुरुष, वर्ग-जाति के विभिन्न पहलुओं को उठाया। गोदान, मैला आँचल, राग दरबारी, आपका बंटी, गुनाहों का देवता जैसे उपन्यास हिंदी साहित्य के कीर्ति-स्तंभ हैं।


साहित्य और समाज का अंतर्संबंध


साहित्य और समाज का पारस्परिक संबंध है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य भी समाज को प्रभावित करता है। साहित्य समाज की समस्याओं को उठाता है, विसंगतियों पर प्रश्न करता है और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।


प्रेमचन्द ने गोदान में किसानों की दुर्दशा का चित्रण किया। फणीश्वर नाथ रेणु ने मैला आँचल में ग्रामीण जीवन को उकेरा। कमलेश्वर ने मध्यवर्गीय मानसिकता पर चोट की। यही नहीं, दलित साहित्य, नारी साहित्य और आदिवासी साहित्य ने समाज के उन वर्गों की आवाज बनकर उभरा जो लंबे समय से उपेक्षित थे।


निष्कर्ष


तो अब आप समझ गए होंगे कि साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं बल्कि मानवीय अनुभूतियों का सजीव संसार है। यह अतीत का दर्पण है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, वर्तमान का साथी है जो समकालीन समस्याओं को समझाता है और भविष्य का वाहक है जो नई दिशाएँ दिखाता है।


साहित्यिक मूल्यों से वंचित समाज उस वन की तरह है जहाँ हरियाली तो है परन्तु फूल और फल नहीं हैं। संवेदनाशून्य समाज सूखे वृक्ष के समान होता है। इसलिए स्वस्थ समाज के लिए स्वस्थ साहित्य का होना आवश्यक है।


आइए, हम अधिक से अधिक साहित्य पढ़ें, अच्छे साहित्य को प्रोत्साहित करें और अपने जीवन को आनंद, ज्ञान और संवेदना से समृद्ध बनाएँ। क्योंकि जैसा कि महाकवि सुभाषित कहते हैं -


"साहित्य संगीत कला विहीना: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीना।"


अर्थात जो साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह बिना पूंछ और सींग वाले पशु के समान है।


तो आइए, मानव बने रहने के लिए साहित्य, कला और संगीत से जुड़े रहें। साहित्य पढ़ें, साहित्य को जिएँ और साहित्य की इस अमूल्य निधि को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।

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